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Wednesday, August 1, 2018

भारत की भूगर्भिक संरचना एवं चट्टटानें




  •  कार्बोनीफेरस युग में पृथ्वी के सभी स्थलखंड आपस में एक दूसरे से जुड़े थे, इस वृहद् महाद्वीप को "पैंजिया " नाम दिया गया था।
  •  इसके चारों ओर एक बहुत बड़े महासागर का विस्तार था जिसे "पैंथालासा " कहा गया। 
  •  ट्रियासिक कल के अंत में पैंजिया का विभाजन शुरू हो गया जिसके कारण एक भाग का उत्तर की तरफ और दूसरे भाग का दक्षिण की तरफ प्रवाह  हुआ।
  •  इस विभाजन के परिणामस्वरूप उत्तरी भाग लॉरेशिया (अंगारा लैंड ) तथा दक्षिण भाग गोंडवाना लैंड  कहलाया। 
  •  स्थलीय भागों के मध्य एक उथले व संकीर्ण महासागर का विकास हुआ जिसे टेथिस सागर कहा गया। 
**** वर्तमान में पैंजिया का अवशिष्ट अंटार्कटिका में मौजूद है। 
**** पैंथालासा ही वर्तमान का प्रशांत महासागर है। 

  • जुरासिक युग में गोंडवाना लैंड का विभाजन हो गया।  ज्वारीय बल के कारण यह प्रायद्वीप भारत , मेडागास्कर , ऑस्ट्रेलिया , अंटार्कटिका आदि कई भागों में बाँट गया। 
पर्वतों के विकास के चरण :- 
                 मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति चार अवस्थाओं में हुई -----
 १- प्रथम चरण -  इस चरण में अरावली पर्वत की उत्पत्ति हुई , जो विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं पूर्व कैंब्रियन धारवाड़ क्रम की चट्टानों से बनी है। अरावली पर्वत प्राचीन अवशिष्ट पर्वत के  विद्यमान है। 
  २- द्वितीय चरण - इस चरण में केलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति हुई। भारत में इस समय  भूसन्नति से पूर्वी घाट पर्वत की उत्पत्ति हुई। 
३ - तृतीय चरण -  इस चरण में हर्सीनियन युग के पर्वतों का निर्माण हुआ था। भारत में इस समय विंध्य भूसन्नति से विंध्याचल एवं सतपुड़ा पर्वत की उत्पत्ति हुई। विंध्याचल एवं सतपुड़ा के बीच एक भ्रंश घाटी की अवस्थिति के कारण विंध्याचल और सतपुड़ा के मोड़दार पर्वत के साथ साथ भ्रंशित पर्वत भी कहा जाता है। 
४ - चतुर्थ चरण - इस चरण में अल्पाइन क्रम के पर्वतों का निर्माण हुआ  है।  इस समय भारत में वृहद् , मध्य एवं शिवालिक हिमालय श्रेणियों का विकास हुआ है। हिमालय पर्वत श्रेणी नवीनतम मोड़दार पर्वत है ,इसी समय पश्चिम घाट के पर्वतों का निर्माण भी हुआ।  


भारतीय चट्टानों का वर्गीकरण 

आर्कियन क्रम की चट्टान :-
  • इन चट्टानों का निर्माण तप्त पृथ्वी के ठंडा होने के परिणामतः हुआ , ये प्राचीनतम और मूलभूत  चट्टाने हैं। 
  • इनमे जिवावशेष नहीं पाया जाता। 
  •  आग्नेय चट्टानों के रूपांतरण के कारन ही नीस का निर्माण होता है जो की ग्रेनाइट की तरह हैं। 
  • बुंदेलखंड नीस सबसे प्राचीन है।
  •  ये मुख्यतः कर्नाटक , तमिलनाडु , आँध्रप्रदेश , मध्य प्रदेश , ओड़िसा , छोटा नागपुर पठार तथा राजस्थान के दक्षिण पूर्वी भाग में पायी जाती है। 



धारवाड़ क्रम की चट्टानें :-

  • आर्कियन क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण के फलस्वरूप इनका निर्माण हुआ। 
  • इनमे भी जीवाश्म नहीं होता है। 
  • अरावली पर्वत का निर्माण इसी क्रम की चट्टान से हुआ है जो की संसार की प्राचीनतम मोड़दार पर्वत है। 
  • इस क्रम की चट्टानों का विकास कर्णाटक के धारवाड़ और शिमोगा जिले में हुआ। 
  • दक्षिणी दक्कन प्रदेश में उत्तरी कर्नाटक के बेलारी ,शिमोगा जिला , नागपुर , जबलपुर , गुजरात के चम्पानेर श्रेणी में धारवाड़ क्रम की चट्टान है। 
  • उत्तर भारत में धारवाड़ क्रम की चट्टानें  लद्दाख , जास्कर , गढ़वाल , कुमायूं तथा शिलांग में हैं। 
  • ये आर्थिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं , सभी प्रमुख धात्विक खनिज (लोहा , सोना, मैगनीज ,आदि ) इनमें पाए जाते हैं। सोना कर्नाटक में क़्वार्टज़ चट्टानों की अधिकता के कारण व धारवाड़ की घाटी में बहुतायत पाया जाता है। 


कुडप्पा क्रम की चट्टानें :-

  • धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण के फलस्वरूप कुडप्पा क्रम की चट्टानों का निर्माण हुआ , ये परतदार चट्टानें हैं। 
  • ये कम रूपांतरित हैं लेकिन जीवाश्म का अभाव इनमें भी है। ये आर्थिक दृष्टि से कम उपयोगी हैं। 
  • इनका  आँध्रप्रदेश के कुडप्पा जिले के नाम पर हुआ है। ये राजस्थान में भी पायी जाती हैं। ये कृष्णा नदी

    घाटी , नल्लामलाई श्रेणी ,चेयार श्रेणी तथा पापाधानी श्रेणी में भी पायी जाती हैं। 
  • ये बलुआ पत्थर , चूना पत्थर , संगमरमर , एस्बेस्टस आदि के लिए प्रसिद्ध है।  
विंध्यन क्रम की चट्टानें :- 
  •  इसका निर्माण कुडप्पा क्रम के बाद हुआ है।  छिछले सागर एवं नदी घाटियों के तलछट के निक्षेपण से इसका निर्माण हुआ , ये भी परतदार चट्टानें हैं। 
  • इनमें सूक्ष्म जीवों के जीवाश्म प्रमाण मिलते हैं। 
  • इस क्रम की चट्टानें विंध्यन पर्वत श्रेणी, मालवा पठार , सोन घाटी , सेमरी श्रेणी , बुन्देलखंड आदि में मिलती हैं। 
  • ये भवन निर्माणी पत्थरों के लिए प्रसिद्ध हैं। दिल्ली का लालकिला , साँची का स्तूप , जामा मस्जिद , आगरा किला , सिकंदरा आदि इन्ही पत्थरों से बना है। 
  • मध्य प्रदेश के पन्ना जिले एवं कर्नाटक की गोलकुंडा के हीरे की खान इसी तरह के क्रम में पायी जाती है। 
गोंडवाना क्रम की चट्टानें  :- 


  • इस क्रम की चट्टानों का निर्माण कार्बोनिफेरस से जुरैसिक युग के बीच हुआ था। ये परतदार चट्टानें हैं। 
  • दामोदर , सोन , महानदी , गोदावरी , वर्धा आदि नदियों की घाटियों में इस तरह की चट्टानों का वितरण पाया जाता है। 
  • अवसादी भूगर्भिक संरचना के कारण ये पेट्रोलियम के संभावित संचित भंडार हैं। 
  • भारत का 98 %कोयला इसी संरचना में पाया जाता है। 
दक्कन ट्रैप :-


  • मेसोजोइक युग के अंतिम कल (क्रिटेशियस युग ) में प्रायद्वीपीय भारत में ज्वालामुखी क्रिया प्रारम्भ हुई , इस तरह लावा के उद्गार के फलस्वरूप इन चट्टानों का निर्माण हुआ। 
  • यह संरचना बेसाल्ट एवं डोलोराइट चट्टानों से निर्मित है , इनके विखंडन से काली मिटटी का निर्माण हुआ।
  • यह संरचना महाराष्ट्र के अधिकांश भाग , गुजरात , मध्य प्रदेश , तमिलनाडु , एवं आंध्र प्रदेश के कुछ भागों में पायी जाती है। 
टर्शियरी क्रम की चट्टानें  :- 


  • इनका निर्माण इयोसीन युग से लेकर प्लायोसिन युग के मध्य हुआ। इसी काल में हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। 
  • महान हिमालय - ओलिगोसीन काल ,  लघु या मध्य हिमालय - मायोसीन काल ,  शिवालिक - प्लायोसिन काल 
  • असम , राजस्थान एवं गुजरात के खनिज तेल इयोसीन एवं ओलिगोसीन काल की संरचना में पाए जाते हैं। 
  • टर्शियरी काल को चार भागों में बाँटा गया है - इयोसीन , ओलिगोसीन , मायोसीन , प्लायोसिन 
क़्वार्टरनरी (नवजीव ) क्रम की चट्टानें :-


  • इस काल की संरचना सिंधु व गंगा के मैदानी भागों में पायी जाती हैं। 
  • इसे प्लीस्टोसीन वो होलोसीन काल में बाँटा गया है। 
  • मध्य व प्रारम्भिक प्लीस्टोसीन काल में पुरानी जलोढ़ मृदा का निर्माण हुआ , जिसे बांगर कहा जाता है। 
  • नवीन जलोढ़ मृदा का निर्माण अंतिम प्लीस्टोसीन काल में शुरू हुआ और वर्तमान होलोसीन काल में भी जारी है। इसे खादर के नाम से जाना जाता है। 
  • कश्मीर घाटी का निर्माण प्लीस्टोसीन काल में हुआ , यह घाटी प्रारम्भ में एक झील थी। 
  • थार मरुस्थल में भी प्लीस्टोसीन काल के निक्षेप मिलते हैं , कच्छ का रन पहले समुद्र का भाग था। प्लीस्टोसीन व होलोसीन काल में यह अवसादी निक्षेप से भर गया। 


निर्माण क्रम =
               अरावली - पूर्वीघाट - दक्कन ट्रैप - हिमालय  

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