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Saturday, June 2, 2018

MAURYAN EMPIRE part-1

Mauryan Empire , indian history


मौर्य साम्राज्य (323 ई.पू. से 184 ई.पू.)--

मौर्य वंश के प्रमुख शासक 


चन्द्रगुप्त मौर्य (322ई.पू.--298ई.पू.)  
  • नंदों के शासन के अंतिम दिनों में उनकी कमजोरी और बढ़ती जा रही  थी उसका फायदा उठाते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य नाम से विदित चाणक्य की सहायता से अंतिम नन्द वंशीय शासक घनानंद का तख़्त पलट किया और 25 वर्ष की आयु में (322 ई ० पू ० ) मौर्य राजवंश की स्थापना की थी।
  • सर्व प्रथम सर विलियम जोंस ने सैंड्रोकोट्स की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य से की थी। 
  • स्ट्रैबो के अनुसार चन्द्रगुप्त का एक उपनाम पालिब्रोथस (पाटलिपुत्रक ) भी था। 
  • विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए 'वृषाल 'शब्द का प्रयोग हुआ है। वृषाल शब्द से आशय निम्न मूल से है। 
  • चंद्र गुप्त ने व्यापक विजय करके प्रथम अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की थी। 
  •  चन्द्रगुप्त के शत्रुओं के विरूद्ध चाणक्य ने जो चालें चलीं उनका विस्तृत उल्लेख मुद्रा राक्षस नामक नाटक में है जिसकी रचना विशाखदत्त ने नौवीं सदी में की थी। 
  • जस्टिन नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त ने अपनी 6,00,000 की फ़ौज से पूरे भारत को रौंद दिया, यह बात कितनी सही है इसमें शक हो सकता है परन्तु यह निश्चित रूप  से सही है  कि चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर भारत को सेल्यूकस की गुलामी से मुक्त करा दिया था जो कि सिंधु नदी के पश्चिम का इलाका था। 
  • सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त से किया और मेगस्थनीज को अपने राजदूत के रूप में उसके दरबार में भेजा था।  
  • चन्द्रगुप्त के विशाल साम्राज्य का विस्तार उत्तर -पश्चिम में हिंदकुश से लेकर  बिहार , ओड़िसा ,बंगाल के बड़े भागों के अतिरिक्त , उत्तरी  कर्नाटक  तक था।   
  • मौर्यों का शासन तमिलनाडु तथा पूर्वोत्तर के कुछ भागों को छोड़कर लगभग पूरे भारत पर था। 
  • चंद्रगुप्त के शासन काल  में ही सौराष्ट्र के गवर्नर ने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था। 
  • चंद्र गुप्त के बंगाल विजय का उल्लेख महास्थान अभिलेख में किया गया है।  
  • चन्द्रगुप्त मौर्य जैन धर्म का समर्थक था। उसने जैन मुनि भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली थी। 
  • कहा जाता है कि मगध में 12 वर्ष का अकाल पड़ा तो चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र सिंहसेन के पक्ष में सिंहासन त्यागकर भद्रबाहु के साथ श्रवण बेलगोला चला गया तथा 298 ई०पू० में सल्लेखना द्वारा शरीर त्याग दिया। 
बिन्दुसार (298 -272 ई०पू०) :-
  • बिन्दुसार चन्द्रगुप्त का पुत्र था। 
  • यूनानियों ने इसे अमित्रघात या अमित्रचेट्स कहा जिसका अर्थ है शत्रुओं का नाशक। 
  • जैनग्रंथ राजबलि कथा में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है। 
  • बौद्ध ग्रन्थ दिव्यदान के अनुसार बिन्दुसार के शासन काल में तक्षशिला में विद्रोह हुआ जिसका दमन करने क लिए उसने अपने पुत्र अशोक को भेजा था । 
  • स्ट्रैबो के अनुसार सीरिया के शासक ऐंटियोक्स ने डाइमेक्स नाम का अपना एक राजदूत बिन्दुसार के दरबार में भेजा था। 
  • बिन्दुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था। दिव्यादान से पता चलता है की राज सभा में आजीवक संप्रदाय का एक ज्योतिष रहता था। 
  • बिन्दुसार ने लगभग 24 वर्ष शासन किया , किन्तु महाभारत में कहा गया है कि बिन्दुसार ने 27 वर्ष तक राज्य किया। 

सम्राट अशोक (273 ई.पू.-232ई.पू. ) :-
  • बिन्दुसार की मृत्यु के उपरांत अशोक मौर्य साम्राज्य का शासक बना। 
  • शासक के रूप में अशोक विश्व इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है। 
  • सिंहली अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों का वध कर के मौर्य साम्राज्य का राज सिंहासन प्राप्त किया था। 
  • अशोक का राज्याभिषेक बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 218 वर्ष बाद हुआ था। 
  • अशोक को ग्रंथों और अभिलेखों में देवनामपियद्शी  कहा गया है। 
  • अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 9 वें वर्ष (260ई.पू. ) में कलिंग पर आक्रमण करके अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। 
  • कौटिल्य के अनुसार कलिंग हाथियों के लिए प्रसिद्ध था जिसकी वजह से अशोक ने आक्रमण किया था लेकिन इस पर बहुत विश्वास नहीं किया जा सकता। 
  • अशोक पहला राजा था जो जिसने अपने अभिलेखों के सहारे सीधे अपनी प्रजा को संबोधित किया। 
  • अशोक का नाम केवल प्रथम लघु शिलालेख की प्रतियों में मिलता है जो कर्नाटक के तीन स्थान और मध्य प्रदेश के एक स्थान पर पाई गई हैं , अन्य सभी लेखों , अभिलेखों में केवल देवानांप्रिय पियदसि  उपाधि का उल्लेख है। 
  • प्राकृत में लिखे ये अभिलेख साम्राज्य भर के अधिकांश भागों में ब्राह्मी लिपि में लिखित हैं। किन्तु पश्चिमोत्तर भाग में ये खरोष्ठी और आरामाइक लिपि में लिखे गए हैं। 
  • कलिंग के हाथी गुफा अभिलेख से प्रकट होता है कि अशोक के कलिंग आक्रमण के समय कलिंग पर "नंदराज " नाम का राजा राज्य करता था। 
  • कलिंग युद्ध और विजय का उल्लेख अशोक के 13 वें शिलालेख में विस्तृत रूप से किया गया है। 
  • अशोक का साम्राज्य उत्तर -पश्चिम सीमान्त प्रान्त (अफगानिस्तान ), दक्षिण में कर्नाटक , पश्चिम में काठियावाड़ और पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला था। 
  • पुराणों में अशोक को ' अशोक वर्धन ' कहा गया है। मौर्य शासक बनने से पहले वह उज्जैन का गवर्नर था।
  •  व्हेनसांग के अनुसार अशोक ने श्री नगर की स्थापना की थी जो की आज जम्मू कश्मीर की राजधानी है। 
  • अशोक ने नेपाल में ललित पाटन नामक नगर का निर्माण कराया था। 
  • कल्हण द्वारा लिखित ग्रन्थ राजतरंगिणी के अनुसार अपने जीवन के शुरू के दिनों में अशोक शैव धर्म का उपासक था। 
  • राज्य के अंदर उसने एक तरह के अधिकारी की नियुक्ति थी जिसे राजुक कहते थे और उसका काम प्रजा को पुरस्कार और दंड देने का था। 
  • उसने अपने राज्य में पशु पक्षी , जानवर आदि की हिंसा , शिकार पर रोक लगा दी थी। 
  • बौद्ध धर्म के अनुसार कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। 
  • अशोक के बौद्ध धर्म का होने का सबसे सबल प्रमाण उसके (विराट -राजस्थान ) लघु शिलालेख से प्राप्त होता है , जिसमें अशोक ने स्पष्ट रूप से बुद्ध धम्म एवं संघ का अभिवादन किया है। 
  • अशोक के शासन काल  में बौद्ध परिषद् का तीसरा महासम्मेलन(संगीति )हुआ था।
  • अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर ऐसे अनेक कमजोर शासक आसीन हुए , जो मौर्य साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बचा पाने में असमर्थ साबित हुए। 
  • अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य के उत्तराधिकारियों का क्रम  कुछ इस तरह था - मुजाल , दशरथ , सम्प्रति , सलिसुक , देववर्मन , और सतधनवा। 
  • मौर्य साम्राज्य का अंतिम शासक वृहद्रथ था। जिसकी हत्या करने के पश्चात उसके सेनापति पुष्यमित्रशुंग  ने 105 ई.पू.में शुंग वंश की स्थापना की थी। 
 
साम्राज्य का संगठन :-

मौर्यों ने बड़ा ही विस्तृत प्रशासन तंत्र स्थापित किया था।  मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से हमें  तत्कालीन स्थिति की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। मेगस्थनीज यूनान का राजदूत था और उसे सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा था।  वह मौर्यों की राजधानी पाटलिपुत्र में रहता था और उसने  न केवल पाटलिपुत्र अपितु पूरे मौर्य साम्राज्य शासन का विवरण लिख छोड़ा।  मेगस्थनीज के इस विवरण को कौटिल्य के अर्थशास्त्र से परिपूरित किया सकता है।

      चन्द्रगुप्त मौर्य स्वेच्छाधारी शासक था और सारे अधिकार अपने ही हाथों में रखता था।  अर्थशास्त्र के अनुसार राजा का आदर्श उच्च होता है , उसका कथन है की प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के दुःख में ही राजा का दुःख है। परन्तु यह ठीक से नहीं खा जा सकता है की चन्द्रगुप्त ने इसका पालन कहाँ तक किया। मेगस्थनीज के अनुसार राजा की सहायता के लिए एक परिषद् गठित थी , बड़े बड़े बुद्धिमान लोग इसके सदस्य थे लेकिन इसका उल्लेख कहीं  नहीं मिलता की राजा इस परिषद की राय मानने को बाध्य हो। ऊँचे पदाधिकारियों का चयन इस परिषद से ही किया जाता था।
  • मौर्य शासन का सर्वोच्च पदाधिकारी सम्राट था। वह कार्यपालिका , व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका का प्रधान था। 
  • साम्राज्य अनेक प्रांतों में बंटा था। हर प्रान्त एक एक राजकुमार के जिम्मे होता था। 
  • राजकुमार राजवंश की किसी संतान को ही बनाया जाता था। 
  • प्रान्त भी छोटी छोटी इकाइयों में विभक्त थे। ग्रामांचल और नगरांचल दोनों के प्रशासन की व्यवस्था थी। 
  • पाटलिपुत्र ,कौशाम्बी ,उज्जयिनी ,तक्षशिला उस समय क प्रसिद्ध नगर थे। 
  • सम्राट को शासन में सहायता प्रदान करने हेतु मंत्रिपरिषद की व्यवस्था थी , प्रमुख मंत्रियों को तीर्थ कहा   जाता था। 
  • कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार 18 तीर्थ थे ,सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ या महामात्र मंत्री और पुरोहित थे। 
  • मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र का प्रशासन 6 समितियां करती थी। हर समिति में 5 सदस्य थे। 
  • ये समितियां सफाई ,विदेशियों से रक्षा , जन्म और मृत्यु का लेखा ,बाट माप नियमन आदि काम  करते थे। 
  • केंद्रीय शासन के २ दर्जन से अधिक ऐसे  विभाग थे जो राजधानी के आस पास सामाजिक ,आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखते थे। 
  • चन्द्रगुप्त शासन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विशाल सेना थी। 
  • प्लिनी नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 6,00,000 पैदल सिपाही , 30,000 घुड़सवार और  9000 हाथी  थे। 
  • इतनी विशाल और इतने बड़े राज्य को सुचारु रूप से  चलाने के लिए चन्द्रगुप्त ने बहुत ही सुलझा हुआ रास्ता अपनाया। 
  • राज्य ने खेतिहर और शूद्र मजदूरों की सहायता से परती जमीन को उपजाऊ बनवाया। कृषि क्षेत्र  बढ़ने से राजस्व ज्यादा आने लगा जो कि शायद उपज के चौथे हिस्से से  छठे हिस्से  तक  होता था। 
  • जिन किसानों को सिंचाई सुविधा दी गई थी उनसे सिंचाई कर भी वसूला जाता था। 
  • नगरों में जो सामान  बेचने के लिए आते थे उनसे प्रवेश द्वार पर ही कर वसूल लिया जाता था। 
  • इस प्रकार चन्द्रगुप्त ने सुसंगठित प्रशासन तंत्र कायम  किया और मजबूत वित्तीय आधार प्रदान किया। 

                                                                                     *************************  क्रमशः*****

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