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Monday, June 4, 2018

मौर्य शासन की व्यवस्था और महत्व



मौर्यकालीन  समाज :-

  • मौर्यकालीन समाज की जानकारी मुख्यतः कौटिल्य के अर्थशास्त्र और मेगस्थनीज के विवरणों से मिलती है। 
  • मौर्यकाल में साधारण जनता की भाषा पालि थी , इसीलिए अशोक ने अपने सभी अभिलेख इसी भाषा में उत्कीर्ण कराए हैं। 
  • अर्थशास्त्र में १८ अधिकरण और १८० प्रकरण हैं। 
  • संभ्रांत घरों की स्त्रियों को प्रायः अनिष्कासिनी कहा जाता था। 
  • मनुस्मृति और अर्थशास्त्र से पता चलता है कि शूद्रों को संपत्ति का अधिकार प्राप्त था। 
  • मौर्यकालीन समाज वारं व्यवस्था पर आधारित था। 
  • श्रेष्ठ्ता की दृष्टि से क्रमशः ब्राह्मणों और वैश्यों का समाज में सम्मान था , जबकि शूद्रों स्थिति निम्न थी। 
  • बौद्ध साहित्य में  भी ४ वर्णों का उल्लेख पाया जाता है , जिसमें क्षत्रिय , ब्राह्मण , वैश्य का समाजिक सम्मान था किन्तु शूद्र को निम्न माना जाता था। 
  • स्त्रियों में पर्दा प्रथा और सती प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता। 
  • अर्थशास्त्र के अनुसार विवाह के लिए स्त्री की उम्र १२ वर्ष तथा पुरुष की उम्र १६ वर्ष बताई गई है। 
  • स्त्रियों को पुनर्विवाह एवं नियोग की अनुमति थी। 
  • कौटिल्य ने स्त्रियों के तलाक की अनुमति दी है। तलाक के लिए मोक्ष शब्द का प्रयोग किया गया है। 
  • मेगस्थनीज और स्ट्रैबो के अनुसार भारत में दास प्रथा नहीं थी , लेकिन कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का वर्णन किया है। 
  • मेगस्थनीज ने लिखा है कि अंतर्जातीय विवाह की अनुमति नहीं थी और न ही पेशा बदला जा सकता था , दार्शनिक और ब्राह्मण इसके अपवाद थे। 
  • दासों को बड़े पैमाने पर कृषि कार्यों में लगाया जाता था। 
  • प्रवहण एक सामूहिक समारोह था , जिसमें भोज्य व पेय पदार्थ का प्रचुरता में प्रयोग किया जाता था। 
  • हिन्दू विधि ग्रंथों में बार बार लिखा गया है कि राजा को धर्मशास्त्रों में बताए गए नियमों और देश में प्रचलित चारों के अनुसार शासन करना चाहिए। 
  • कौटिल्य ने राजा को सलाह दी कि जब वर्णाश्रम(वर्ण एवं आश्रमों पर आधारित ) धर्म लुप्त होने लगे तो राजा को धर्म की स्थापना  करनी  चाहिए। 
  • अशोक ने अपने अभिलेखों में बताया है कि राजा का आदेश अन्य आदेशों से ऊपर है। 
  • राज्य क्षेत्र विशाल होने और जनजीवन को अपने वश में  रखने के लिए राज्य को विशाल अधिकारी वर्ग रखना पड़ता था। 
  •  प्राचीन इतिहास के किसी भी राजा के समय में इतने अधिकारी नहीं थे  जितना की मौर्यकाल में।
  • प्रशासन तंत्र के साथ गुप्तचरों का भी विस्तृत जाल था। जासूस विदेशों  के साथ साथ अंदरुनी शक्तियों पर भी अपनी पैनी नजर रखते थे। 

केंद्रीय प्रशासन :-

  •  सम्राट को शासन में सहायता प्रदान करने के लिए मंत्रिपरिषद की व्यवस्था थी। प्रमुख मंत्रियों को तीर्थ कहा जाता था।
  • कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार 18 प्रमुख तीर्थ थे। सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ मंत्री और पुरोहित थे। 
  • कौटिल्य ने मौर्य  प्रशासन के  लिए संप्रंग सिद्धांत का प्रतिपादन किया , जिसमें राजा , अमात्य , मित्र , कोष , दुर्ग, सेना तथा देश शामिल था। 
  • मौर्य शसन राजतंत्रात्मक , वंशानुगत , ज्येष्ठाधिकारिता , देव के ग्रंथों तथा निरंकुशता पर आधारित था।
  • मौर्य शासन में केंद्रीय शासन की व्यवस्था थी। 
  • अशोक के अभिलेखों से साम्राज्य के 5 प्रांतों में विभक्त होने का संकेत मिलता है एवं केंद्रीय प्रशासन का प्रांतों पर नियंत्रण था। 
  • मौर्य शासन में  व्यवस्था उनकी गुप्तचर व्यवस्था थी। 
  • अर्थशास्त्र में गुप्तचरों को  स्पर्श , चर , गूढ़ , पुरुष , तपस्वी , दूत ,संस्था, और संचार शब्द बुलाया जाता था। 
  • अधिकतर अधिकारियों को नगद वेतन दिया जाता था। 
  • उच्च कोटि अर्थात मंत्री , पुरोहित , सेनापति  और युवराज को 48 हजार पण की भरी रकम मिलती थी। 
  • पण ३-४ तोले का  चांदी सिक्का था। 
  • सबसे निचले दर्जे के अदिकारियों को कुल मिलाकर 60 पण मिलते थे।

प्रांतीय प्रशासन :-

  • सम्राट के लिए इतने विशाल साम्राज्य पर नियंत्रण रखना संभव नहीं था , प्रशासन की सुविधा के लिए मौर्य साम्राज्य को ५ प्रांतों में विभाजित किया गया था  - उत्तरापथ , दक्षिणा पथ , अवन्तिराष्ट्र , कलिंग , प्राशी जिनकी राजधानी क्रमशः तक्षशिला , स्वर्णगिरी , उज्जयिनी , होसली और पाटलिपुत्र थी। 
  • प्रांतों का शासन राजकुमार या आर्यपुत्र नमक पदाधिकारी करते थे। 
  • चन्द्रगुप्त काल में प्रांतों की संख्या 4 थी, अशोक ने कलिंग को जोड़कर इसे बढाकर 5 किया था। 
  • इन शासित राज्यों के अलावा साम्राज्य के अंतर्गत कुछ अर्ध स्व -शासित प्रदेश थे , जिन पर शासन के लिए स्थानीय राजाओं को मान्यता प्राप्त थी। इनकी गति विधियों पर अन्तपाल पद नियंत्रण रखता था। 

नगर प्रशासन :-
  • मेगस्थनीज के अनुसार नगर प्रशासन 30 सदस्यों के एक मंडल द्वारा संचालित होता था जिन्हें 6 समितियों में विभाजित किया गया था। 
  • नगर में अनुशासन रखने के लिए , अपराधियों पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस व्यवस्था थी जिन्हें "सक्रीय " कहा जाता था। 
  • नगर आयुक्त को एरिस्टोनोमोई कहा जाता था। 
  • कौटिल्य के अनुसार नगर का प्रमुख अधिकारी "नागरिक" होता  था। 
  • महामात्य सबसे उच्च अधिकारी थे जो नगर प्रशासन से संबंधित थे। 


जिला प्रशासन :-
  • जिले को विषय या आहार कहा जाता था, जिसका प्रधान विषयपति होता था। 
  • राजुक की नियुक्ति  जनपदों की देखभाल व निरीक्षण के लिए की जाती थी।  इनके पास कर संग्रह के साथ साथ न्यायिक शक्तियां भी थीं। 
  • जिले से जुड़े अन्य अधिकारीयों में प्रादेशिक तथा युक्त या पूत थे, जो क्रमशः जिलाधिकारी (आर्थिक ) व क्लर्क का काम संभालते थे। 
  • जिला प्रशासन से जुड़े अधिकारी --
                             १ - सीताध्यक्ष    -   कृषि विभाग 
                             २ - पौतवाध्यक्ष  -   माप - तौल विभाग 
                             ३ - अकराध्यक्ष  - खानों का विभाग 
                             ४ -लक्षणाध्यक्ष  - टकसाल विभाग 
                             ५ - मुडाध्यक्ष    - पासपोर्ट विभाग 
                             ६ - सनाध्यक्ष    - बूचड़ खाना विभाग 
                             ७ - नवाध्यक्ष    - जहाजरानी विभाग 
                             ८ - रुपाध्यक्ष    -  सिक्कों का विभाग 

स्थानीय प्रशासन या ग्राम प्रशासन :-
  • ग्राम मौर्य साम्राज्य की सबसे छोटी इकाई थी जिसका प्रधान ' ग्रामिक ' कहलाता था। यह राजकीय कर्मचारी नहीं था इसका निर्वाचन जनता द्वारा किया जाता था। 
  • ग्रामिक को ग्राम के ज्येष्ठ व वरिष्ठ लोग प्रशासनिक कार्य में सहायता करते थे। 
  • गोप तथा स्थानिक गाँव तथा जिले के प्रशासन के बीच एक मध्यवर्ती स्तर की इकाई होती थी , ये संबंधित अधिकारी थे । 
  • ग्रामिक के ऊपर गोप होता था , जिसके अधिकार में 5 -10  ग्राम होता था , जबकि स्थानिक गोप के भी ऊपर होता था जिसके तहत जिले का एक चौथाई क्षेत्र होता था। 
  • इन ग्राम पदाधिकारियों पर समाहर्ता नामक अधिकारी का नियंत्रण होता था। 
  • मौर्य काल में विभिन्न प्रकार के गांव थे -
                              आयुधीश   -   सैनिक सेवा प्रदान करने वाला 
                                 कुटव     -  कच्चा माल प्रदान करने वाला 
                              परिहारिक  - कर युक्त गांव 
                              हिरण्य       - अनाज और स्वर्ण के रूप में कर देने वाला गाँव 
                               विशिष्ट      -बेगारी करने वाला गाँव 
सैन्य व्यवस्था :-
  • मौर्यकालीन सैन्य व्यवस्था का प्रधान सम्राट था। 
  • मौर्य सेना 5 भागों में विभाजित थी - पैदल ,अश्व , हाथी , रथ , नौसेना 
  • सैन्य मंत्रालय का प्रधान सेनापति होता था। सैनिकों की नियुक्ति , प्रशिक्षण , वेतन , प्रबंध , अस्त्र - शस्त्र व इसकी आपूर्ति सेनापति का मुख्य कार्य था।  
  • सैन्य प्रबंध की देख रेख करने वाला अधिकारी "अन्तपाल " कहा  जाता था , इसके साथ ही वह सीमान्त क्षेत्रों का व्यवस्थापक भी था। 
  • अर्थशास्त्र में नवाध्यक्ष के उल्लेख से मौर्यों के पास नौसेना होने का भी प्रमाण मिलता है। 
  • खिनी की अनुसार 5 -5 सदस्यों वाली 6 समितियां सैन्य प्रशासन के लिए जिम्मेदार थीं - 1. पैदल सेना , 2 - घुड़सवार , ३- रथ सेना , 4 -गज सेना , 5 - नौसेना , 6 -रसद विभाग 
न्याय विभाग :-
  • मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था का सर्वोच्च पद न्यायाधीश का था। 
  • न्याय व्यवस्था कठोर थी , न्याय का उद्देश्य सुधारवादी न होकर आदर्शवादी था। 
  • मौर्या न्याय व्यवस्था के 4 प्रमुख आधार - धर्म , व्यवहार , चरित्र और राजाज्ञा था। 
  • ग्राम सभा सबसे छोटा न्यायालय था। उसके ऊपर क्रमशः संग्रहण , द्रोणामुख तथा जनपद न्यायलय थे। 
  • नागरिक मामलों को हल करने वाले न्यायाधीश को व्यवहारिक कहा जाता था। 
  • ग्राम और सभा सम्राट के न्यायालय के अतिरिक्त बीच के सभी न्यायालय धर्मस्थीय और कंटकशोधन में विभक्त थे। 
  • धर्मस्थीय न्यायालय  नागरिकों के पारस्परिक मामलों का निस्तारण करते थे जबकि राज्य तथा नागरिकों के मध्य होने वाले विवादों के निर्णय करने वाले न्यायालय कंटकशोधन कहलाते थे। 
  • कुवचन , मान हानि , मार पीट , संबंधी मामले भी धर्मस्थीय न्यायलय में जाते थे , जिन्हें पाक पारुश्य या दण्ड पारुष्य कहते थे। 
मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था :-
  • अर्थव्यवस्था कृषि ,पशुपालन और वाणिज्य आधारित थी , कृषि ही आय का मुख्य श्रोत था। 
  • प्रतीत होता है की मयूर ,पर्वत और अर्धचन्द्र की छापवाली आहत रजत मुद्राएं मौर्य साम्राज्य की मान्य मुद्राएं थीं। 
  • राज्य की भूमि पर राजा का स्वामित्व था। 
  • राजकीय भूमि की व्यवस्था करने वाला प्रधान अधिकारी सीता धाम कहलाता था। 
  • समाहर्ता कर निर्धारण का सर्वोच्च अधिकारी होता था। 
  • सन्निधाता राजकीय कोषागार और भंडागार का संरक्षक होता था। 
  • राज्य को सिंचाई का प्रबंध करना पड़ता था जिसके बदले में वह कर वसूली करता था। 
  • सिचाई के लिए अलग से उपज के पांचवे से तीसरे भाग तक को कर के रूप में लिया जाता था। 
  • जूनागढ़ अभिलेख से चन्द्रगुप्त के गवर्नर पुष्यमित्र द्वारा सौराष्ट्र में निर्मित झील का उल्लेख मिलता है। 
  • भूमिकर और सिंचाई कर मिलकर लगभग आधा हिस्सा कर के रूप में देना पड़ता था। 
  • मौर्या कालीन उद्योग व्यापार उन्नत थे। 
  • सूती वस्त्रों के  प्रमुख केंद्र वाराणसी , वत्स , माहिष्मती , पुन्द्रु और कलिंग थे। 
  • विदेशी व्यापार मुख्यतः यूनान , रोम ,फ्रांस ,लंका , सुमात्रा, जावा , मिस्त्र , सीरिया से होता था। 
  • व्यापारी संगठित थे , जिनका मुखिया श्रेष्ठिन कहलाता था। इनके ऊपर एक महाभेदी था जो आपस में विवादों को हल कराता था। 
  • मौर्य काल में सोना , चांदी व तांबे के सिक्कों का प्रचलन था। 
मौर्य कालीन कला संस्कृत :-
  • मौर्य काल का विकास राजकीय संरक्षण में हुआ , जिसके अंतर्गत राजप्रसाद , स्तम्भ , गुफा , विहार , स्तूप बनवाए गए। 
  • लोक कलाएं राज्य संरक्षण से मुक्त थीं, इसके अंतर्गत पक्ष न्याथिनी की मूर्तियां बनाईं जाती थीं। 
  • मौर्यकालीन कला का प्रसिद्ध उदाहरण चन्द्रगुप्त का पटना में स्थित राजप्रसाद है , जिसके बारे में पाटियान का कहना है कि यह मानवीय कृति नहीं बल्कि देवनिर्मित है।  
  • अशोक काल में चट्टानों को काटकर कन्दरामों के निर्माण द्वारा वस्तु कला की एक नई शैली का आरंभ किया गया। 
  • स्तंभों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अशोक द्वारा निर्मित सारनाथ का सिंह स्तंभ है जिसके शीर्ष पर ४ सिंह एक दूसरे से पीठ सटाए बैठे हैं। 
  • स्तूप मौर्य कालीन भारत की महत्वपूर्ण देन हैं। 
  • पत्थर के स्तंभ वाराणसी के पास चुनार में तैयार कराए जाते थे और वहां से दक्षिण और उत्तर भारत में पंहुचाए जाते थे।
  • हर स्तंभ पाण्डु रंग वाले बलुआ पत्थर के एक ही टुकड़े का बना है जिनका केवल शीर्ष भाग स्तंभों के ऊपर जोड़ा गया है और उनमें तराशे गए सिंह और सांड विलक्षण वास्तुशिल्प के प्रमाण हैं।  
  • बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने 4000 स्तूपों का निर्माण कराया था। 
  • मथुरा के पास मिली एक यथा मूर्ति , बेसनगर की स्त्री मूर्ति और दीदारगंज से मिली मूर्तियां मौर्य मूर्तिकला की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 
  • मौर्यकालीन मृदभांड , जिन्हें उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड कहा जाता है , कला की उत्कृष्टता के प्रतीक हैं। 
  • मौर्य काल के असाधारण नमूनों में से एक "एकाश्म स्तंभ " है जो एक ही पत्थर से बना है जिसकी ऊंचाई कई मीटर है। 
  • रामपुरवा से प्राप्त वृषभ मूर्ति में गति , सजीवता एवं लालिप्त परिलक्षित होता है ,यह मौर्य कालीन कला की अनुपम देन है। 
प्राचीन भारत की प्रमुख पुस्तकें :-
१-   कल्पसूत्र           -      भद्रबाहु 
२-  कीर्ति कौमुदी     -   सोमेश्वर 
३ -  प्रबंध कोष        -    राजशेखर 
४ - मालविकाग्निमित्रम   - कालिदास 
५ - पृथ्वी राज रासो      -  चंद बरदाई 
६ - अर्थशास्त्र             - कौटिल्य 
७ - रसमाला             -  सोमेस्वर 
८ - मुद्राराक्षस          - विशाखदत्त 
९ - हर्षचरित            - बाणभट्ट 
१० - बुद्ध चरित        - अश्वघोष 
११ - कुमारपाल चरित -  हेमचंद 
१२ - गौड़वाहो           -  यशोवर्मन 

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