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Friday, August 31, 2018

समानता का अधिकार


 समानता का अधिकार
  • संविधान का भाग - 3 , अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 समता का अधिकार प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद 14 समता के अधिकार का मूल सिद्धांत प्रतिपादित करता है तथा अनुच्छेद 15 -18 समता के अधिकार के मूल सिद्धांत के विशिष्टताओं को बताता है। 
  • अनुच्छेद 14 -  भारत में सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण प्रदान करता है। 
    • इसके अनुसार राज्य देश के किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। 
  • अनुच्छेद 15 -   राज्य को धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग या जन्म स्थान के आधार विभेद से रोकता है। 
  • अनुच्छेद 16 - सार्वजनिक नियोजन (सरकारी नौकरियों ) में अवसर की समानता के बारे में है। 
  • अनुच्छेद 17 - अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाएगा , अस्पृश्यता से उतपन्न होने वाली निर्योग्यता को लागू करना अपराध घोषित किया गया है। 
  • अनुच्छेद 18 -  सेना या शिक्षा संबंधी उपाधियों के अतिरिक्त अन्य उपाधियों को राज्य द्वारा दिए जाने पर प्रतिबंध। 
विधि के समक्ष समता - अनु. 14  : -
  •   "विधि के समक्ष समता " का विचार ब्रिटिश मूल का है , जबकि " विधियों के समान संरक्षण " को अमेरिका के संविधान से लिया गया है। 
  • अनुच्छेद 14 में "व्यक्ति" शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात अनुच्छेद 14 नागरिकों , अनागरिकों , कम्पनी , निगम , व्यक्ति समूह आदि सब पर लागू  होता है।  
  • अनुच्छेद 14 में नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत निहित है। 
  • मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ वाद में विधि क शासन  को संविधान का आधारभूत ढांचा घोषित किया गया है। 
  • अनुच्छेद  14 वर्ग विभेद को मना करता है लेकिन वर्गीकरण को मानता है। 
  • वर्गीकरण किया जा सकता है यदि उसका आधार उपयुक्त हो जैसे -
    •  भौगोलोक परिस्थिति के आधार पर 
    • राज्य के पक्ष में 
    • विशेष न्यायलय या प्रक्रिया के संबंध में 
    • ऐतिहासिक आधार पर 
    • शिक्षा के आधार पर 

धर्म ,जाति आदि आधार पर विभेद का प्रतिषेध  - अनु. 14  : -

  • अनुच्छेद 15 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल नागरिकों के लिए हैं। 
  • अनुच्छेद 15 में कुल 5 उपखण्ड हैं। 
  • अनुच्छेद 15 (1) - केवल धर्म ,मूलवंश ,जाति ,लिंग ,जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर नागरिकों के मध्य विभेद करने से राज्य को रोकता है। 
  • केवल से तात्पर्य है कि विभेद मात्र धर्म , मूलवंश , जाति , लिंग, जन्मस्थान आधार पर निषेध है इसके अतिरिक्त भाषा , निवास स्थान आदि आधार पर विभेद हो सकता है। 
  • अनुच्छेद 15 (2) - कोई भी नागरिक केवल धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग , जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश या उपयोग करने के लिए किसी शर्त या प्रतिबंध में  नहीं होगा। 
    •  सार्वजनिक स्थल अर्थात - दुकान , भोजनालय ,मनोरंजन स्थल , कुआँ , तालाब , स्नानघाट , सड़क आदि। 
  • अनुच्छेद 15 (3), 15 (4), 15 (5 ) अनुच्छेद 15 (1 ) व 15 (2 ) के अपवाद हैं। 
  • अनुच्छेद 15(3 ) -  यह अनुच्छेद राज्य को स्त्रियों और बालकों हेतु विशेष प्रावधान करने की शक्ति प्रदान करता है।
    •  अनुच्छेद 15(3 )  के आधार पर ही महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम -2005 , को संवैधानिक घोषित किया गया है। 
  • अनुच्छेद 15(4 ) - इस अनुच्छेद द्वारा शिक्षण संस्थाओं में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों , अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण दिया गया है। 
    •  अनुच्छेद 15(4 ) को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम 1951 द्वारा स्थापित किया गया था। 
  • अनुच्छेद 15(5 ) -  इसके माध्यम से निजी शिक्षण संस्थाओं में छात्रों के प्रवेश के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। 
    •  अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान इस दायरे में नहीं हैं। 
    • केंद्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण ) अधिनियम -2005 को इसी के अनुसार संवैधानिक घोषित किया गया। 
अवसर की समानता   - अनु. 16 : -
  • अनुच्छेद 16 , लोक नियोजन में अवसर की समानता की प्रत्याभूति प्रदान करता है। 
  • अनुच्छेद 16 द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल नागरिकों को हैं। 
  • अनुच्छेद 16 (1 ) - राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन अथवा नियुक्ति के संबंध में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगें। 
    •  यह केवल प्रारंभिक नियुक्ति के लिए ही नहीं बल्कि पदोन्नति , पदच्युति , वेतन , अवकाश , ग्रेच्युटी ,पेंशन आदि में भी लागु होता है। (UPPSC -1994 )
  • अनुच्छेद 16(2)- इस विषय में केवल धर्म , मूलवंश ,जाति , लिंग , जन्म स्थान , उद्भव एवं निवास के आधार पर नागरिकों के बीच कोई भेद भाव नहीं किया जाएगा।  
  • अनुच्छेद 16(3) -  यह अनुच्छेद 16(2) का अपवाद है। 
    •  यह संसद को शक्ति प्रदान करता है कि वह विधि द्वारा किसी राज्य की कुछ सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए उस राज्य में "निवास की अहर्ता " को विहित कर दे। 
    • इस शक्ति के प्रयोग में संसद ने लोक नियोजन अधिनियम -1957 पारित किया था। 
    • किसी व्यक्ति को इस आधार पर निर्योग्य नहीं माना जाएगा कि  वह किसी राज्य विशेष का निवासी नहीं है। 
    • किन्तु यह नियम हिमांचल प्रदेश , मणिपुर ,त्रिपुरा में उनके पिछड़ेपन के कारण लागू नहीं है। 
  • अनुच्छेद 16(4) -  इसमें पिछड़े वर्गों को आरक्षण  का प्रावधान है। 
    •  इसके अंतर्गत राज्य जाति के आधार पर विभेद कर सकती है। 
    • यह अनुच्छेद 16(2) का दूसरा अपवाद है। 
    • अनुच्छेद 340 के अंतर्गत राष्ट्रपति "पिछड़ा वर्ग आयोग " की नियुक्ति करता है। 
    • मंडल आयोग के मामले में यह अवधारित किया गया कि पिछड़े वर्ग का निर्धारण जाति के आधार पर किया जा सकता है, जाति को भी सामाजिक वर्ग माना गया। 
    • मंडल आयोग वाद में अवधारित किया गया कि पिछड़े वर्ग को दिया गया 27 % आरक्षण वैध है किन्तु पिछड़ों में संपन्न वर्ग को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। 
    • अनुच्छेद 16(4क) - इसे 77 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 द्वारा जोड़ा गया। इसमें राज्य को शक्ति दी गयी कि वह अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है , यदि उसकी राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। 
    • अनुच्छेद 16(4ख ) - इसे 81 वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया , इससे सेवाओं के आरक्षण में अग्रनयन(Carry for ward rule) को मान्यता दी गयी। 
    • इसके अनुसार यदि किसी वर्ष आरक्षित स्थान नहीं भरे जा सके तो बकाया आरक्षित स्थानों को एक अलग वर्ग माना जाएगा तथा आगे के वर्षों में अलग श्रेणी के रूप में भरा जाएगा। 
  • अनुच्छेद 16 (5) - राज्य द्वारा निर्मित कोई ऐसी विधि जो किसी धार्मिक या सांप्रदायिक संस्था के किसी पदाधिकारी या सदस्य के रूप में किसी विशिष्ट धर्म या संप्रदाय के लोगों की नियुक्ति किये जाने का प्रावधान करती है , प्रवर्तनीय होगा। 
अस्पृश्यता का अंत  - अनु. 17  : -
  • अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करने की व्यवस्था और किसी भी रूप में इसका आचरण निषिद्ध करता है। इससे उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागु करना दंडनीय अपराध है। 
  • अनुच्छेद 35 संसद को अस्पृश्यता के संबंध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करती है। 
  • संसद  प्रयोग कर के "अस्पृश्यता अपराध अधिनियम - 1955 " पारित किया था। 1976 में इसमें संशोधन कर इसे सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया। 
  • अनुच्छेद 17 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं वरन प्राइवेट व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू होते हैं। 
उपाधियों  का अंत  - अनु. 18  : - 
  • इसके द्वारा राज्य को उपाधियाँ प्रदान करने तथा नागरिकों व अनागरिकों को उपाधियाँ ग्रहण करने से प्रतिषेध किया गया है। 
  • अनुच्छेद 18(1 ) -  राज्य , सेना तथा विद्या संबंधी सम्मान के शिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
  • अनुच्छेद 18(2 ) -  कोई भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि ग्रहण नहीं करेगा। 
  • अनुच्छेद 18(3) - ऐसा विदेशी व्यक्ति जो भारत में कोई लाभ या विश्वास का पद धारण करता है वह किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्रपति के सहमति पश्चात ही ग्रहण कर सकता है। 
  • अनुच्छेद 18(4) - कोई व्यक्ति जो भारत में किसी लाभ या विश्वास के पद पर है , किसी विदेशी राज्य से कोई भेंट , उपलब्धि , पद बिना राष्ट्रपति के अनुमति के ग्रहण नहीं कर सकता। 
  • अनुच्छेद 18 सिर्फ निदेशात्मक है , आदेशात्मक नहीं अर्थात इसका उल्लंघन दंडनीय नहीं है। 
  • बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996 ) के मामलें में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारित किया गया कि भारत रत्न , पद्म विभूषण और पद्म श्री अलंकरण अनु. 18(1) में प्रयुक्त  "उपाधि" शब्द के अंतर्गत नहीं आते हैं। 

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