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Friday, August 17, 2018

भारत के भू आकृतिक भाग




भारत के भू आकृतिक भाग

उच्चावच एवं संरचना के आधार पर भारत को पांच भू आकृतिक भागों में बाँटा जा सकता है -



उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र की 
  • भारत की उत्तरी सीमा पर विश्व की सबसे ऊँची एवं पूर्व -पश्चिम  में विस्तृत सबसे बड़ी पर्वत माला है। यह  विश्व की नवीनतम मोड़दार पर्वतमाला है। 
  • हिमालय की पर्वत श्रेणियां प्रायद्वीपीय पत्थर की तरफ उत्तल और तिब्बत की तरफ अवतल हो गयी हैं। 
  • पश्चिम से पूर्व की तरफ पर्वतीय भाग की ऊंचाई बढ़ती है लेकिन चौड़ाई घटती है एवं ढाल भी तीव्र होता जाता है। 
  • उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को चार प्रमुख समानांतर पर्वत श्रेणी क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है :- 
  • 1. ट्रांस हिमालय : - 
    •  इसके अंतर्गत काराकोरम ,लद्दाख , जास्कर आदि पर्वत श्रेणियां हैं। 
    • इनका निर्माण हिमालय से भी पहले हो चुका था। 
    • ये मुख्यतः पश्चिमी हिमालय में हैं। 
    • गॉडविन आस्टिन (8611 मी. ) या K2 , काराकोरम श्रेणी की सर्वोच्च चोटी है, जो कि भारत की सबसे ऊँची चोटी है। 
    • ट्रांस हिमालय वृहत हिमालय से "इंडो सांग्पो शचर जोन" के द्वारा अलग होती है। 
  • 2. हिमाद्रि या सर्वोच्च या वृहद् हिमालय :- 
    • यह हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है , इसकी औसत ऊंचाई 6000 मी. है जबकि चौड़ाई 120 से 190 किमी है। 
    • विश्व के लगभग सभी महत्वपूर्ण शिखर यथा एवरेस्ट , कंचनजंघा , नंगा पर्वत , नंदा देवी , कामेट , नामचा बरवा आदि इसी में आते हैं। 
    • वृहद् हिमालय , लघु हिमालय से  "मेन सेंट्रल थ्रस्ट " के द्वारा अलग होता है। 
  • 3. हिमाचल श्रेणी अर्थात लघु या मध्य हिमालय  :-
    •  इसकी औसत चौड़ाई 80 से 100 किमी एवं सामान्य ऊंचाई 3700 से 4500 मी. है। 
    • पीरपंजाल , धौलाधार , नागटिब्बा ,मसूरी , महाभारत आदि श्रेणियां इसी पर्वत श्रेणी का भाग हैं। 
    • वृहद्व व लघु हिमालय के मध्य कश्मीर घाटी , लाहुल -स्पीति , कुल्लू व कांगड़ा घाटियां मिलती हैं। 
    • यहां के अल्पाइन चरागाहों को कश्मीर में मर्ग और उत्तराखंड में वुग्याल या पयार  कहते हैं। 
    • इसी श्रेणी में शिमला , कुल्लू , मनाली ,मसूरी , दार्जिलिंग आदि स्थान पड़ते हैं। 
    • लघु हिमालय , शिवालिक से मेन बॉउंड्री फॉल्ट के द्वारा अलग होता है। 
  • 4.  शिवालिक अथवा निम्न या बाह्य हिमालय  : -
    •  यह 10 से 50 किमी चौड़ा और 900 से 1200 मी. ऊँचा है। यह खंडित रूप में है। 
    • यह हिमालय का नवीनतम भाग है। 
    • शिवालिक और लघु हिमालय के बिच कई घाटियाँ हैं जिन्हें पश्चिम में दून  भी कहते हैं , जैसे देहरादून , हरिद्वार आदि। 
    •  निचले भाग को तराई कहते हैं, यह दलदली और वनाच्छादित प्रदेश है। 
  • हिमालय के उत्तरी पश्चिम और उत्तरी पूर्वी छोरों पर सिंधु व दिहांग गार्ज मिलते हैं। 
  • तिब्बत के पत्थर की तरफ ढाल मंद है अतः हिमालय के उत्तर में हिमनदों का जमाव अधिक मिलता है। 

  • हिमालय क्षेत्र में काराकोरम , शिपकिला ,नाथुला , बोमडिला आदि दर्रे भी मिलते हैं। 
  • जम्मू कश्मीर के लद्दाख में स्थित काराकोरम दर्रा भारत का सबसे ऊँचा दर्रा (5654 मी. )है, यहां से चीन जाने वाली एक सड़क भी बनाई गई है। 
  • बुर्जिल दर्रा श्रीनगर से गिलगित को जोड़ती है। 
  • जोजिला दर्रा , जास्कर श्रेणी में है और श्री नगर से लेह को जोड़ता है। 
  • पीरपंजाल दर्रे से कुलगाँव से कोठी जाने का मार्ग गुजरता है। 
  • बनिहाल दर्रे से जम्मू से श्रीनगर का मार्ग गुजरता है। जवाहर सुरंग इसी में स्थित है। 
  • बड़ालाचला दर्रे से मंडी से लेह जाने का मार्ग गुजरता है। 
  • थांगला , माना , निति , लिपुलेख दर्रे उत्तराखंड के कुमाऊं श्रेणी में हैं। इन्ही से मानसरोवर झील और कैलाश घाटी का मार्ग गुजरता है। 
  • नाथुला और जेलेप्ला दर्रे सिक्किम में हैं। यहां से दार्जिलिंग और चुम्बी घाटी से होते हुए तिब्बत जाने का मार्ग गुजरता है। 
  • बोमडिला और यांगयाप दर्रा , अरुणाचल प्रदेश में है। बोमडिला दर्रे से तवांग घाटी होकर तिब्बत का मार्ग गुजरता है जबकि यांगयाप दर्रे के पास ही ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है। 
  • दिफू और पांगसांड दर्रा अरुणाचल प्रदेश में भारत- म्यांमार सीमा पर है। 
  • मणिपुर में स्थित तुजू दर्रे से इम्फाल से तामू व म्यांमार जाने का मार्ग गुजरता है। 

विभिन्न नदियों ने हिमालय क्षेत्र को 4 प्रमुख प्राकृतिक भागों में एक दूसरे से पृथक कर दिया है : -


कश्मीर या पंजाब हिमालय :-  
  • सिंधु और सतलज के बीच 560 किमी में फैला हुआ है। 
  • यहां हिमालय क्रमिक ऊंचाई प्राप्त करता है। 
  • जास्कर व पीरपंजाल श्रेणी इसी के भाग हैं। 
  • हिमालय की चौड़ाई यहां सर्वाधिक है जो कि लगभग 250 से 400 किमी है। 
कुमाऊँ हिमालय :-
  • यह सतलज और काली नदियों के बीच 320 किमी में फ़ैला है। 
  • यह उत्तराखंड क्षेत्र में विस्तृत है। 
  • नंदा देवी , कामेट , बद्रीनाथ , केदारनाथ , त्रिशूल आदि इसके प्रमुख शिखर हैं।  
नेपाल हिमालय :-
  • यह काली और तीस्ता नदियों के बीच 800 किमी की दूरी में फैला है। 
  • यहां हिमालय की चौड़ाई अत्यंत कम है , परन्तु हिमालय के सर्वोच्च शिखर यथा एवरेस्ट ,कंचनजंगा , मकालू  यहीं पर हैं। 
असम हिमालय :-
  • यह तीस्ता तथा दिहांग नदियों के बीच 720 किमी की दूरी में फैला है। 
  • यहां हिमालय की ऊंचाई पुनः कम होती जाती है।



प्रायद्वीपीय पठार 
  • यह प्राचीन गोंडवाना का त्रिभुजाकार भाग है, जिसकी औसत ऊंचाई 600 से 900 मी है। 
  • अरावली , राजमहल और शिलांग पहाड़ियां इसकी उत्तरी सीमा पर हैं। 
  • प्रायद्वीपीय पठार का ढाल उत्तर और पूर्व की तरफ है जबकि दक्षिण भाग में इसका ढाल पश्चिम से  पूर्व की तरफ है। 
  • प्रायद्वीपीय पठार कई भागों में बंटा है -
    •  मालवा का पठार 
    • बैतूल और बघेलखंड का पठार (मध्य प्रदेश )
    • बुन्देलखंड का पठार 
    • दंडकारण्य पठार (उड़ीसा , छत्तीसगढ़  व आंध्र प्रदेश )
    • रायलसीमा का पठार (कर्नाटक व आंध्र प्रदेश )
    • तेलंगाना का पठार 
    • शिलॉन्ग का पठार 
    • हजारीबाग और छोटा नागपुर का पठार (झारखण्ड )
  • अरावली श्रेणी विच्छिन्न पहाड़ी श्रृंखला रूप में गुजरात से दिल्ली तक विस्तृत है। 
  • इसकी चौड़ाई दक्षिण पश्चिम से उत्तर पूर्व की तरफ क्रमशः घटती जाती है। 
  • अरावली की अधिकतम ऊंचाई माउंट आबू के गुरु शिखर(1722 मी.) पर है। 
  •  विंध्याचल अत्यधिक पुराना व घर्षित मोड़दार पर्वत श्रेणी है , यह मालवा पठार के दक्षिण में है व उत्तरी भारत को दक्षिण भारत से अलग करता है। 
  • सतपुड़ा ब्लॉक पर्वत का उदाहरण है। इसके दोनों तरफ नर्मदा और ताप्ती की भ्रंश घाटियां हैं। यह विन्धयाचल के समांतर व पश्चिम में राजपिपला पहाड़ियों से शुरू हो कर महादेव और मैकाल पहाड़ियों के रूप में छोटा नागपुर पठार की पश्चिमी सीमा तक विस्तृत  है। सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी महादेव पहाड़ी के पंचमढ़ी के निकट धूपगढ़  है। 
  • मैकाले पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर अमरकंटक है जहां से नर्मदा कर सोन नदिओं का उद्गम होता है। 
  • मैकाले से पूर्व की तरफ छोटा नागपुर और राजमहल की पहाड़ियां हैं। 
  • मेघालय की गारो -खासी -जयंतिया पहाड़ियां भी वस्तुतः दक्षिणी प्रायद्वीप का ही अंग हैं। 
  • शिलॉन्ग पठार , छोटा नागपुर का ही अग्र  भाग है। 
पश्चिमी घाट
  • यह ताप्ती के मुहाने से लेकर कन्याकुमारी के अंतरीप तक1600 किमी की लंबाई में फैला है। 
  • यह वह भ्रंश है जो अफ्रीका के भारत से  अलग होने में बना था। 
  • पश्चिमी घाट के उत्तर में गिर की पहाड़ियां हैं जहां प्रसिद्द एशियाई शेर पाए जाते हैं। 
  • पश्चिमी घाट को सह्याद्रि भी कहा जाता है। 
  • थालघाट , भोरघाट , पालघाट इसके प्रमुख दर्रे हैं। 
  • महाराष्ट्र के उत्तरी सह्याद्रि में स्थित थालघाट (583 मी.)दर्रे  से मुंबई -नागपुर-कोलकाता रेल व सड़क मार्ग गुजरता है। 
  • भोरघाट भी उत्तरी सह्याद्रि में है , इससे मुंबई - पुणे -बेलगाँव -चेन्नई रेल व सड़क मार्ग गुजरते हैं। 
  • पालघाट केरल में है,यह नीलगिरि व अन्नामलाई श्रेणी के बीच स्थित है। 
  • उत्तरी सह्याद्रि की सबसे ऊँची चोटी कलसुबाई है। 
  • महाबळेश्वर भी इसकी ऊँची छोटी है जहाँ से कृष्णा नदी का उद्गम होता है। 
  • नीलगिरि की अधिकतम ऊंचाई डोडाबेटा (2637 मी.)है। 
  • प्रसिद्ध स्थान ऊटी या उटकमंडलम नीलगिरि में ही स्थित है। 
  • नीलगिरि के दक्षिण में अन्नामलाई श्रेणी है जिसमें दक्षिण भारत व  पश्चिमी घाट का सर्वोच्च शिखर अनाईमुडी (2695 मी.) है। 
  • शेनकोट्टा गैप कार्डेमम पहाड़ियों में है। 
  • पर्यटक स्थल,कोडायकनाल  पालनी पहाड़ियों में स्थित है। 

 पूर्वी घाट 
  • यह श्रृंखला रूप में नहीं मिलती हैं क्योंकि गोदावरी ,कृष्णा , कावेरी आदि नदियों ने जगह - जगह इसे काट दिया है। 
  • पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी उड़ीसा के निकट " अरायोकोंडा" (विशाखापत्तनम चोटी) है। 
  • पूर्वी भाग के सबसे उत्तरी भाग में उत्तरी पहाड़ी या उत्तरी सरकार , मध्य में कुडप्पा जबकि दक्षिण में इसे तमिलनाडु पहाड़ी के नाम से जाता है। 
  • नल्लामल्ला , एर्रामल्ला,वेलीकोण्डा  व पालकोण्डा कुडप्पा पहाड़ी के एवं शेवराय व जवादी तमिलनाडु पहाड़ी के अंतर्गत आते हैं। 
  • इसकी औसत ऊंचाई 600 मी. है , नीलगिरि के निकट दक्षिण में यह सर्वाधिक ऊंचाई प्राप्त करती है। 


उत्तर का विशाल मैदान
  • इसे सिंधु -गंगा -ब्रह्मपुत्र का मैदान भी कहा जाता है। यह जलोढ़ अवसादों से बना है। 
  • अंबाला के आसपास की भूमि इसमें जल विभाजक का कार्य करती है क्योंकि इसके पूर्व की नदियां बंगाल की खाड़ी में और पश्चिम की नदियां अरब सागर में गिरती हैं। 
  • विशिष्ट धरातलीय स्वरुप के आधार पर इस मैदान को चार भागों में बाँटा जा सकता है - 
    •  भाबर प्रदेश :- यह शिवालिक की तलहटी में सिंधु से लेकर तीस्ता तक अविच्छिन्न रूप से मिलता है। इसकी चौड़ाई 8 से 16 किमी है। कंकड़ पत्थरों की अधिकता के कारण यहां नदियां विलुप्त हो जाती हैं। 
    • तराई प्रदेश  : - यह भाबर के दक्षिणी भाग में है।  अत्यधिक आर्द्रता के कारण यहां भूमि दलदली होती है। भाबर में विलुप्त नदियां यहां पुनः सतह पर आ जाती हैं , परन्तु गति धीमी होती है। यहां घने वनों के कारण जैव विविधता का भंडार है। 
    • बांगर प्रदेश  : - यह मैदानी क्षेत्र का वह उच्च भाग है जहाँ  बाढ़ का पानी नहीं पंहुचता।  इसका निर्माण पुराने जलोढ़ों से हुआ है और इसमें कंकड़ पत्थर की अधिकता है।  इसे कहीं कहीं भुड़ू  भी कहा जाता है। 
    • खादर प्रदेश  : - यह नवीन जलोढ़ से निर्मित है।  यहां बाढ़ हर वर्ष नई उर्वर मिटटी लाता है अतः इसे "कछारी प्रदेश " या "बाढ़ का मैदान " भी कहा जाता है।  खादर का ही विस्तार आगे चलकर डेल्टा रूप में भी हुआ है। 
  • पंजाब के पश्चिम का मैदान मुख्यतः बांगर से निर्मित है। 
  • पश्चिमी सप्तसिंधु प्रदेश जहाँ आर्यों ने अपनी पहली बस्ती बसाई थी , में विभिन्न नदियां यथा सिंधु , झेलम , चिनाव , रावी ,व्यास ,सतलज होने के कारण हर दो नदियों के बीच दोआब क्षेत्र बनते हैं। 
  • सतलज की पुरानी धारा ही राजस्थान में घग्घर के नाम से जानी जाती है। 
  • पंजाब से पूर्व जाने पर गंगा - यमुना दोआब है जो कि पुराने बांगर जलोढ़ से निर्मित है। 
  • प्रायद्वीपीय पठार और हुगली के बीच के क्षेत्र को गिरिपदीय मैदान भी कहा जा सकता है। 
तटवर्ती मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार के पूर्व और पश्चिम में दो संकरे तटीय मैदान हैं जिन्हें क्रमशः पूर्वी तटीय व पश्चिमी तटीय मैदान कहा जाता है। 
  •  इनका निर्माण सागरीय तरंगों द्वारा अपरदन व निक्षेपण एवं पठारी नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के जमाव से हुआ है। 
  • पश्चिमी तटीय मैदान  गुजरात से कन्याकुमारी के तटीय क्षेत्र में विस्तृत है। यह संकरी जलोढ़ पट्टी है जिसके बीच बीच में पहाड़ भी हैं। नर्मदा ताप्ती के मुहाने पर यह सबसे ज्यादा चौड़ी है। काठियावाड़  क्षेत्र में समुद्री निक्षेप अधिक हैं , जबकि काठियावाड़ के मैदानी क्षेत्र में रेगुर मिट्टी (बेसाल्ट लावा के अपक्षय से निर्मित काली मिट्टी ) है। गुजरात से गोवा तक का मैदान कोंकड़ तट कहलाता है।  गोवा से कर्नाटक के मंगलौर का भाग कन्नड़ तट कहलाता है , यह अत्यधिक संकरा है। मंगलौर से कन्याकुमारी का तटीय मैदान मालाबार तट कहलाता है। मालाबार तट में लैगून की प्रधानता है जिन्हे कयाल कहा जाता है। 
  • पूर्वी तटीय मैदान , पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में अधिक चौड़ा है। नदियों के डेल्टाई भागों में इसकी चौड़ाई और भी बढ़ जाती है। दक्षिणी भाग में इसकी अधिकतम चौड़ाई है। 
  • उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के तटवर्ती मैदान को उत्कल तट , कलिंग तट या उत्तरी सरकार कहते हैं। 
  • कृष्णा -गोदावरी डेल्टा से  कन्याकुमारी तक विस्तृत आंध्रप्रदेश से तमिलनाडु तक विस्तृत तटीय मैदान को कोरोमंडल तट कहा जाता है। 
  • कम कटा छँटा होने की वजह से इस तट पर प्राकृतिक पोतश्रयों की कमी है। 
द्वीपीय भाग
  •   भारत के मुख्य द्वीपीय भाग अंडमान -निकोबार व लक्षद्वीप हैं। 
  • अंडमान निकोबार द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में हैं , लैंडफाल द्वीप इस द्वीप का सबसे उत्तरी द्वीप है। 
  • कोको जलमार्ग इसे म्यांमार के कोको द्वीप से अलग करता है जहां चीन ने इलेक्ट्रॉनिक निगरानी तंत्र लगाया है। 
  • नारकोंडम द्वीप में दो सुषुप्त और बैरन द्वीप में एक सक्रिय ज्वालामुखी है। 
  • उत्तरी अंडमान एक पर्वतीय क्षेत्र है जहां सैंडल पीक नामक महत्वपूर्ण चोटी है। 
  • मध्य अंडमान , निकोबार समूह का सबसे बड़ा द्वीप है। 
  • दक्षिण अंडमान में इस समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर है। प्रसिद्ध सेल्युलर जेल यहीं स्थित है। 
  • माऊंट हेरियट और माऊंट हेवलॉक यहां के अन्य द्वीप हैं जहां राष्ट्रीय पार्क भी हैं। 
  • लघु अंडमान , अंडमान समूह का सबसे दक्षिणी भाग है , 10* चैनल इसे कार निकोबार से अलग करता है। 
  • ग्रेट निकोबार , अंडमान - निकोबार द्वीप समूह का दक्षिणतम द्वीप है , इंदिरा पॉइण्ट यही पर है। 
  • अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप समूह , एक प्रवाल द्वीप समूह है। 
    • ये सागरीय चबूतरों पर चूने पर निर्वाह करने वाले जीवों के अस्थि पंजरों से निर्मित हैं। 
    • अमीनदीव, लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप है। 
    • कवरत्ती , लक्षद्वीप की राजधानी है। यह मिनिकॉय द्वीप से 9* चैनल द्वारा अलग होता है। 
    • मिनिकॉय द्वीप और मालदीव 8* चैनल से अलग होते हैं। 

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