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Saturday, August 18, 2018

Satavahana Dynasty



सातवाहन युग

  •  उत्तर भारत में मौर्यों के सबसे बड़े देशी उत्तराधिकारी शुंग हुए उसके बाद कण्व हुए , जबकि दक्क्न और मध्य भारत में मौर्यों के उत्तराधिकारी सातवाहन हुए। 
  • सातवाहन और पुराणों में लिखित आंध्र एक ही माने जाते हैं। पुराणों में आंध्र का उल्लेख है सातवाहन का नहीं, जबकि सातवाहन अभिलेखों में आंध्र नाम नहीं मिलता। सातवाहनों के सबसे पुराने अभिलेख ईसा -पूर्व पहली सदी के हैं। 
  • कुछ पुराणों के अनुसार आन्ध्रों ने लगभग 300 वर्षों तक शासन किया जबकि सातवाहनों के शासन की भी अवधि लगभग यही थी। 
  • सातवाहनों ने लगभग ईसा पूर्व प्रथम सदी में ही कण्वों को पराजित कर मध्य भारत के कुछ भागों में अपनी सत्ता स्थापित की थी। 
  • आरम्भिक सातवाहन राजा आंध्रा में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में थे जहाँ से उनके प्राचीनतम सिक्के और अभिलेख मिलते हैं। उन्होंने अपनी सत्ता ऊपरी गोदावरी घाटी में स्थापित की थी। 
  • धीरे धीरे सातवाहनों ने अपनी सत्ता का विस्तार कर्नाटक और आंध्रा की तरफ किया , वहां  उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी शक थे , ऐसी भी एक समय आया जब शकों ने सातवाहनों की महाराष्ट्र और पश्चिम भारत से उन्हें बेदखल कर दिया था। 
  • सातवाहन वंश के ऐश्वर्य को गौतमी पुत्र शातकर्णि (106 -130 ई.) के द्वारा पुनः वापस लाया गया। 
  • उसने शकों को हराया , अनेक क्षत्रिय शासकों का नाश किया , उसने खुद को एकमात्र ब्राह्मण कहा। उसने मालवा और काठियावाड़ पर भी अधिकार जमा लिया था जो कि पहले शकों के अधीन था।  
  •  उसने क्षहरात वंश का नाश किया क्योंकि उसका शत्रु नहपान इसी वंश का था। 
  • गौतमीपुत्र शातकर्णि का साम्राज्य उत्तर में मालवा से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला था। 
  • शकों ने कोंकण समुद्र तट और मालवा पर अधिकार के लिए सातवाहनों से पुनः संघर्ष शुरू कर दिया। 
  • सौराष्ट्र के शक शासक रूद्र दामन प्रथम (130 -150 ई. ) ने सातवाहनों को दो बार हराया , मगर वैवाहिक संबंधों के कारण उनका नाश नहीं किया। 
  • भौतिक संस्कृत : -
    •  सातवाहन शासक ब्राह्मण थे और वैष्णव देवताओं के उपासक थे , फिर भी उन्होंने भिक्षुओं को ग्रामदान दे कर बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया।  उनके काल में बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय का विकास था। 
    •  सातवाहनों के समय में कृषि यंत्रो का विकास हुआ और लोहे का प्रयोग अच्छी तरह से हुआ। 
    • करीमनगर जिले में उत्खनन में लोहार की एक दुकान भी मिली थी , संभवतः वे वारंगल और करीमनगर के लौह अयस्क का प्रयोग करते थे। 
    • सातवाहनों ने सोने के सिक्के नहीं चलवाए अर्थात वे इसका प्रयोग बहुमूल्य धातु की तरह किये। उनके सिक्के अधिकांशतः शीशे के हैं जो की दक्क्न में पाए गए , उन्होंने तांबे और कांसे की मुद्रा भी चलाई। 
    • सातवाहन लोग  धान की रोपाई करना जानते थे। 
    • करीमनगर जिले के पेड्डबंकूर में पकी ईंट और छत में लगने वाला चिपटे छेददार खपड़े का प्रयोग मिलता है। यहाँ द्वितीय शताब्दी के बने ईंटों के 22 कुँए भी मिले हैं। 
    • ब्राह्मणों को भूमि अनुदान या जागीर देने वाले प्रथम शासक सातवाहन ही हुए , हालाँकि भिक्षुओं के लिए इस प्रकार के अनुदान के उदाहरण अधिक मिलते हैं। 
    • इस काल में गांधिक वे शिल्पी थे जो इत्र आदि बनाते थे ,वर्तमान उपनाम गाँधी यहीं से उत्पन्न हुआ है। 
    • यह समाज पुरुष प्रधान नहीं था क्योंकि राजाओ के नाम के आगे माता का नाम जुड़ा था, इनके समाज में माता की प्रतिष्ठा अधिक थी लेकिन सिंहासन का उत्तराधिकारी पुत्र ही होता था। 
    • सातवाहनों की प्रशासनिक इकाइयाँ लगभग अशोक के समय की तरह ही रही ,जिला को आहार ही कहा जाता था , उनके अधिकारी मौर्य काल की तरह ही अमात्य -महामात्य कहलाते थे। 
    • गौर करने लायक है कि सेनापति को प्रांत का शासनाध्यक्ष या गवर्नर बनाया जाता था। 
    • ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन का काम गौल्मिक  को सौंपा जाता था। गौल्मिक सेना टुकड़ी का प्रधान होता था। 
    • सातवाहन  शासन में दमन नीति का प्रमुख स्थान था। 
    • सातवाहन राज्य में सामंतों की तीन श्रेणियां थीं , श्रेणी का सामंत राजा कहलाता था जिसे सिक्के ढालने का अधिकार था , द्वितीय श्रेणी का महाभोज कहलाता था  और तृतीय श्रेणी का सेनापति कहलाता था। 
    • सातवाहन काल में पश्चिमोत्तर दक्कन और महाराष्ट्र में पत्थरों को काट कर चैत्य (बौद्ध मंदिर ),और विहार (भिक्षु निवास )बनाए गए।  सबसे मशहूर चैत्य पश्चिमी दक्कन में कार्ले का है। 
    • नागार्जुनकोंड और अमरावती के स्तूप अत्यधिक मशहूर हुए। 
    • सात वाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत थी। सभी अभिलेख प्राकृत और ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं। 
    • प्राकृत ग्रन्थ गाथाहासत्तसई (गाथासप्तशती )  हाल नामक सातवाहन राजा की रचना बताई जाती है। 

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