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Saturday, August 25, 2018

Fundamental Rights -1


मौलिक अधिकार 
  भाग -३ ,अनु. 12 - अनु.35   

  • मूल अधिकार का सर्वप्रथम विकास ब्रिटेन में हुआ था। 
  • भारत में मूल अधिकारों की मांग सर्वप्रथम संविधान विधेयक 1895 के माध्यम से की गई थी।
  •  भारतीयों को मूल अधिकार प्रदान करने की मांग 1917 - 1919 के दौरान कांग्रेस द्वारा , 1925 में एनी बेसेंट द्वारा कॉमनवेल्थ ऑफ़ इंडिया बिल के माध्यम से तथा 1928 में मोतीलाल नेहरू द्वारा नेहरू रिपोर्ट के माध्यम से की गयी थी।
  •  1927 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन तथा 1930 के करांची अधिवेशन में इसके संबंध में प्रस्ताव पास किया गया था। 
  • 1935 के भारत शासन अधिनियम में इसे शामिल नहीं किया गया था। 
  • संविधान निर्माण के समय संविधान सभा द्वारा मूल अधिकार तथा अल्पसंख्यक अधिकार के संबंध में परामर्श हेतु सरदार वल्लभ भाई पटेल के अध्यक्षता में एक परामर्श समिति का गठन किया एवं एक उपसमिति का गठन जे.बी. कृपलानी की अध्यक्षता में किया गया था , इनकी सिफारिश के आधार पर भारतीय संविधान के भाग - 3 में मूल अधिकार संबंधी प्रावधान किये गए। 
  • भारत में मूल अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त विशेष अधिकार है। 
  • मूल अधिकार वे अधिकार हैं जो व्यक्ति के जीवन के लिए मूलभूत तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गए हैं।  सामान्यतया व्यक्ति के इन अधिकारों में राज्य के द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। 
  • भारतीय संविधान का भाग तीन , अनुच्छेद 12 से 35 (कुल 27 ) मूल अधिकारों के बारे में हैं। 
  • भारतीय संविधान का भाग तीन अमेरिका के बिल ऑफ़ राइट्स से प्रेरित है। 
  • भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों की प्रकृति सकारात्मक और नकारात्मक दोनों है। 
  • मूल अधिकार न्याय योग्य हैं , अतः इन्हें न्यायालय द्वारा लागू कराया जा सकता है। 
  • संसद अनु. 368 के तहत इसमें संशोधन कर सकती है।  
                              भारत का मूल संविधान कुल 7 मौलिक अधिकार अपने नागरिकों को प्रदान करता था , किन्तु 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा संपत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया। संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (च) तथा अनुच्छेद 31 में वर्णित था जो कि अब अनु. 300 क के तहत एक विधिक अधिकार है। 
            वर्तमान में भारतीय नागरिकों को कुल 6 मूल अधिकार प्राप्त हैं - 
  1. समानता का अधिकार  (अनुच्छेद 14 - अनुच्छेद  18 )
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19  - अनुच्छेद  22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 - अनुच्छेद  24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 - अनुच्छेद 28 )
  5. संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 - अनुच्छेद 30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
अनु. 12 - परिभाषा 
अनु. 13 - मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां 
अनु. 14 - विधि के समक्ष समानता 
अनु. 15 - धर्म, मूलवंश , जाति ,लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध 
अनु. 16 - लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता 
अनु. 17 - अस्पृश्यता का अंत 
अनु. 18 - उपाधियों का अंत 
अनु. 19 - वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण 
अनु. 20 - अपराधों के लिए दोषसिद्धके संबंध में संरक्षण 
अनु. 21 - प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण 
अनु. 22 - कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध से संरक्षण 
अनु. 23 - मानव के दुर्व्यापार और बलातश्रम का प्रतिषेध 
अनु. 24 - कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध 
अनु. 25 - देश के सभी नागरिकों को अंतःकरण की स्वतन्त्रता , किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने ,आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता 
अनु. 26 -धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतन्त्रता 
अनु. 27 - किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय के बारे में स्वतन्त्रता 
अनु. 28 -कुछ शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा , उपासना में उपस्थित होने की स्वतन्त्रता 
अनु. 29 - अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण 
अनु. 30 -शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार 
अनु. 32 - संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए उपचार  
अनु. 33 - संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को लागू होने में उपांतरण  करने की शक्ति 
अनु. 34 - जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है , तब इस भाग द्वारा प्राप्त अधिकारों पर निर्बंधन 
अनु. 35 - इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए विधि।  

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