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Thursday, May 31, 2018

उत्तर भारत का मैदान व पठार




INDAIN PLAIN AND PLATEAU

उत्तर भारत का मैदान 
  • उत्तर भारत का मैदान सिंधु , गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा बहाकर लाए गए जलोढ़ निक्षेप से बना है।
  • इस मैदान की पूर्व से पश्चिम लम्बाई लगभग 3200 किमी है। 
  • इसकी औसत चौड़ाई 150 से 300 किमी है। 
  • जलोढ़ निक्षेप की अधिकतम गहराई 1000 से 2000 मीटर है। 
  • उत्तर से दक्षिण दिशा में इन मैदानों को ३ भागों में बाँट सकते हैं - भाभर , तराई और जलोढ़ मैदान। 
  • जलोढ़ मैदान को 2 भागों में बांटा जा सकता है - खादर ,बांगर 
  • भाभर 8 से 10 किमी चौड़ाई में पतली पट्टी है जो शिवालिक गिरिपाद के समानांतर फैली है। इसके परिणामस्वरूप हिमालय पर्वत श्रेणियों  से बाहर  निकलती नदियां यहां पर भारी जल-भार , जैसे -बड़े शैल और गोलाश्म जमा कर देती हैं और कभी कभी स्वयं ही इसमें  लुप्त हो जाती हैं। 
  • भाभर के दक्षिण में तराई क्षेत्र है जिसकी चौड़ाई 10 से 20 किमी है। भाभर क्षेत्र में लुप्त नदियां इस प्रदेश में धरातल पर फिर से  निकलती हैं और इनकी निश्चित बहाव ,रास्ता न होने की वजह से यह क्षेत्र अनूठा बन जाता है जिसे तराई कहते हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति से  ढका रहता है और विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों का घर है। 
  • तराई से दक्षिण में मैदान है जो पुराने और नए जलोढ़ से बना है, इसी वजह  खादर  और बांगर कहा जाता है।  इस मैदान में नदी प्रौढ़ावस्था में बनने वाली अपरदनि और निक्षेपण स्थलाकृतियां , जैसे -बालू रोधिका, विसर्प , गोखुर झीलें और गुंफित नदियां पायी जाती हैं। 
  • ब्रह्मपुत्र घाटी का मैदान नदीय द्वीप और बालू रोधिकाओं की उपस्थिति के लिए प्रसिद्ध है। यहां ज्यादातर क्षेत्र में समय -समय पर बढ़ आती रहती है और नदियां  बदलती रहती हैं जिससे गुंफित वाहिकाएं बनती हैं। 
  • उत्तर भारत के मैदान में बहने वाली विशाल नदियां अपने मुहाने पर विश्व के बड़े बड़े डेल्टाओं का निर्माण करती  हैं , जैसे सुंदरवन डेल्टा।  सामान्य तौर पर  सपाट मैदान है जिसकी समुद्र  औसत ऊंचाई 50  से 100 मीटर है। 
  •  ब्रह्मपुत्र नदी अपनी घाटी में उत्तर -पूर्व से दक्षिण -पश्चिम दिशा में बहती है परन्तु बांग्लादेश में प्रवेश करने से पहले धुबरी के समीप यह नदी दक्षिड़ की तरफ 90डिग्री मुड़ जाती है। 



 प्रायद्वीपीय पठार 

  • नदियों के मैदान से 150 मीटर ऊंचाई से ऊपर उठता प्रायद्वीपीय पठार तिकोने आकार वाला कटा -फटा भू -खंड है जिसकी ऊंचाई 600 से 900 मीटर है। 
  • उत्तर पश्चिम में दिल्ली , कटक (अरावली विस्तार ), पूर्व में राज महल पहाड़ियां ,पश्चिम में गिर पहाड़ियां और दक्षिण में इलायची (कार्डामम ) पहाड़ियां , प्रायद्वीप पठार की सीमाएं निर्धारित  करती हैं। 
  • उत्तर पूर्वे में शिलांग तथा कार्बी -ऐंगलोंग पठार भी इसी भू खंड का विस्तार है। 
  • प्रायद्वीपीय भारत अनेक पठारों  से मिलकर बना है , जैसे - हज़ारीबाग़ पठार , पलायु पठार , रांची पठार , मालवा पठार , कोयंबटूर पठार और  कर्नाटक पठार। यह भारत के प्राचीनतम और स्थिर भू-भागों में से है। 
  • सामान्य तौर पर प्रायद्वीप की ऊंचाई पश्चिम से पूर्व को कम होती चली जाती है जिसका प्रमाण यहां की नदियों के बहाव की दिशा से मिलता है । 
  •  लक्षणों के आधार पर प्रायद्वीपीय पठार को 3 भागों में बनता जा सकता है -

       दक्कन का पठार -
  •  इसके पश्चिम में पश्चिमी घाट , पूर्व में पूर्वी घाट और उत्तर में सतपुड़ा , मैकाल और महादेव पहाड़ियां हैं।
  • पश्चिमी घाट को स्थानीय तौर पर कई नाम दिए गए हैं  जैस एमहराष्ट्रा में सह्याद्रि , कर्नाटक और तमिलनाडु में नीलगिरि और केरल में अन्नामलाई और इलायची पहाड़ियां। 
  • पूर्वी घाट की तुलना में पश्चिमी घाट ऊँचे और अविरत हैं। इनकी औसत ऊंचाई लगभग 1500 मीटर है जो की उत्तर से दक्षिण की तरफ बढ़ती चली  जाती है। 
  • प्रायद्वीपीय पत्थर की सबसे ऊँची चोटी अनाईमुडी (2695 Mt . ) है  जो पश्चिमी  घाट की अन्नामलाई पहाड़ियों में स्थित है। दूसरी सबसे ऊँची छोटी डोडाबेटा है जो की नीलगिरि  पहाड़ियों में है। 
  • अधिकतर प्रायद्वीपीय नदियों की उत्पत्ति पश्चिमी घाट है। 
  • पूर्वी घाट अविरत नहीं है और महानदी , गोदावरी , कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा अपरदित है। यहां की कुछ मुख्य श्रेणियां जवादी पहाड़ी , पालकोण्डा श्रेणी ,नल्लामाला पहाड़ियां और महेंद्र गिरी पहाड़ियां हैं। 
  • पूर्वी और पश्चिमी घाट नीलगिरि पहाड़ियों में आपस में मिलते हैं। 

    मध्य उच्च भाग -
  • पश्चिम में अरावली पर्वत इसकी सीमा बनाते हैं। इसके दक्षिण  में सतपुड़ा पर्वत जो की उच्छिष्ठ पत्थर की श्रेणियों से बना है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई  600 से 900 मीटर है। 
  • ये ढक्क्न पठार की उत्तरी सीमा बनाते हैं। ये अवशिष्ट पर्वतों के अच्छे उदाहरण हैं जो कि काफी हद तक अपरदित हैं और इनकी श्रृंखला टूटी है। 
  • प्रायद्वीपीय पठार  के इस भाग का विस्तार जैसलमेर तक है जहाँ यह अनुदैर्ध्य रेत  के टिब्बों और चाप के आकार के बरखान रेतीले टिब्बों से ढके हैं। 
  • अपने भूगर्भीय इतिहास में यह क्षेत्र कायांतरित प्रक्रिया से गुजर चुका है और कायांतरित चट्टानों , जैसे संगमरमर , स्लेट और नाइस की मौजूदगी इसे प्रमाणित करते हैं। 
  • समुद्र तल से मध्य उच्च भू -भाग की ऊंचाई 700 मीटर से 1000 मीटर के बीच है और उत्तर तथा उत्तर -पूर्व दिशा में इसकी ऊंचाई कम होती चली जाती है।  यमुना की अधिकतर सहायक नदियां विंध्याचल और कैमूर श्रेणियों से निकलती हैं। 
  • बनास , चम्बल की एक मात्र मुख्य सहायक नदी है जो पश्चिम में अरावली से निकलती है। 
  • मध्य उच्च भाग का पूर्वी विस्तार राज महल पहाड़ियों तक है जिसके दक्षिण में स्थित छोटा नागपुर का पठार खनिज  पदार्थों का भंडार है।  

    उत्तर पूर्व पठार -
  • वास्तव में यह प्रायद्वीप पठार का ही एक विस्तारित भाग है , माना  जाता है की हिमालय की उत्पत्ति के समय भारतीय प्लेट के उत्तर -पूर्व दिशा में खिसकने के कारण राज महल पहाड़ियों और मेघालय के पठार के बीच भ्रंश घाटी  बनने से यह अलग हो गया था। 
  • बाद में यह नदी द्वारा जमा किए जलोढ़ द्वारा पाट दिया गया। आज मेघालय और कार्बी ऐंगलोंग पठार इसी कारण से मुख्य प्रायद्वीप पठार से अलग हैं।  
  •  इसमें आवास करने वाली जनजातियों के नाम के आधार पर मेघालय के पठार को 3 भागों में बांटा गया है - गारो पहाड़ियां , खासी पहाड़ियां और जयंतियां पहाड़ियां। असम की कार्बी ऐंगलोंग पहाड़ी इसी का विस्तार है। 
  • छोटा नागपुर पठार की तरह मेघालय के पठार भी कोयला ,लोहा ,चूना पत्थर ,यूरेनियम  जैसे खनिजों का भंडार है। 
  • इस क्षेत्र में अधिकतर वर्षा दक्षिण -पश्चिमी मानसून से होती है और परिणामस्वरूप मेघालय का पठार एक अति अपरदित भूतल है। चेरापूंजी नग्न चट्टानों से ढका स्थान है और यहां वनस्पति लगभग न के बराबर है। 


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