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Monday, May 28, 2018

ईरानी और मकदूनियाई आक्रमण

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ईरानी आक्रमण :-
                   जिस समय मगध के राजा अपना साम्राज्य बढ़ा रहे थे उस समय ईरान के हख़मनी शासक भी अपना राज्य विस्तार कर रहे थे। ईरान के शासकों ने भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर व्याप्त राजनितिक फूट का फायदा उठाया। ईरानी शासक डेरियस 516 ई० पू० में पश्चिमोत्तर भारत में घुस गया और उसने पंजाब, सिंधु नदी  के पश्चिम के इलाके और सिंध को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया। यह क्षेत्र फारस का 20 वां प्रान्त बन गया। उस समय फारस राज्य में कुल मिलकर 28 प्रान्त या क्षत्रपियाँ थीं। भारतीय क्षत्रपी में सिंधु , पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त तथा पंजाब का सिंधु नदी के पश्चिम का वाला हिस्सा था। भारतीय प्रजा  को ईरानी फ़ौज में भर्ती किया जाने लगा। डेरियस के उत्तराधिकारी जरसिस ने यूनानियों के खिलाफ लम्बी लड़ाई में भारतीयों को अपने फ़ौज में भर्ती किया।  माना जाता है कि भारत पर सिकंदर के आक्रमण तक पश्चिमोत्तर हिस्से ईरानी साम्राज्य का अंग बना रहा। 
           भारत और ईरान का यह संपर्क लगभग 200 वर्षों तक बना रहा , इससे भारत व ईरान के व्यापार को बहुत बढ़ावा मिला। ईरानी लिपिकार भारत में लेखन का एक नया खास रूप ले आये जो आगे चलकर खरोष्ठी लिपि नाम से प्रसिद्ध हुई। यह दायीं से बायीं तरफ लिखी जाती थी। अशोक के कुछ अभिलेख इसी लिपि में लिखे हुए पाए गए हैं। पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में ईरानी सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। मौर्या वस्तु कला पर ईरानी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अशोक काल के लेख, राज्यादेश ,स्मारक आदि पर ईरानी कला और प्रभाव बखूबी देखने को मिलता है। 
         धीरे धीरे ईरानियों के जरिये ही  यूनानियों को भारत के साम्राज्य और संपत्ति के बारे में जानकारी मिली , इस जानकारी से भारत की संपत्ति हेतु उनका लालच बढ़ गया और अंततः भारत पर तत्कालीन यूनानी राजा सिकंदर ने आक्रमण कर  दिया। 

सिकंदर का आक्रमण :-
                                ईसा पूर्व चौथी सदी में विश्व पर अपना प्रभाव जमाने में यूनानियों और ईरानियों के बिच संघर्ष होते रहे। मकदूनिया (मेसिडोनिया )के शासक सिकंदर के नेतृत्व में यूनान की फौज  ने अंततः ईरानी साम्राज्य को नष्ट कर दिया , सिकंदर ने तुर्की , इराक ,ईरान को जीत लिया इसके बाद उसने अपने कदम भारत की तरफ बढ़ाने शुरू कर दिए जिसका कारण निश्चित रूप से भारत का वैभव और संपत्ति थी। सिकंदर के अंदर विश्व विजय की महत्वाकांक्षा थी।  इतिहास के जनक कहे जाने वाले हेरोडोटस और अन्य यूनानी लेखकों ने हर जगह भारत को अपार संपत्ति वाला देश कहा है। सिकंदर के आक्रमण के लिए पश्चिमोत्तर भारत की राजनितिक स्थिति एकदम उपयुक्त थी , क्यूंकि यह क्षेत्र कई छोटे राज्यों में बँटा  हुआ था।  सिकंदर को लगा कि इन रजवाड़ों को एक एक कर जीतना ज्यादा आसान है।  इन राज्यों में  2 शासक विश्व विख्यात थे पहले थे तक्षशिला के राजा आम्भी और दूसरे थे पोरस जिसका राज्य झेलम और चिनाब के बीच  पड़ता था। दोनों राजा एक साथ मिलकर निश्चित रूप से सिकंदर को रोक सकते थे , मगर वे दोनों संयुक्त रूप से मोर्चा नहीं बना सके और न ही खैबर दर्रे पर निगरानी रखी जो की भारत में आने का रास्ता था। 
                                 ईरान पर जीत दर्ज करने के बाद सिकंदर अफगानिस्तान के काबुल से होते हुए खैबर दर्रा पर करते हुए 326 ई०पू० में  भारत आया।   सिंधु नदी तक पंहुचने में उसे 5 माह लग गए।  तक्षशिला के शासक आम्भी ने आक्रमणकारी के सामने तुरंत घुटने तक दिए।  इसके बाद  सिकंदर ने अपनी फौजी ताकत बढ़ाई और खजाने की कमी को पूरा किया।  झेलम नदी के किनारे पंहुचने पर सिकंदर का पहला और सबसे शक्तिशाली विरोध पोरस से  हुआ जिसे पितस्ता का युद्ध कहा जाता है , इसे हाइडेस्पेस का युद्ध भी कहा जाता है ।  सिकंदर ने पोरस को हरा दिया लेकिन वह उस बहादुर राजा के बहादुरी और साहस से बहुत प्रभावित हुआ अतः उसका राज्य वापस कर उसे अपना सहयोगी बना लिया। 
                   इसके बाद वह व्यास नदी पर पहुँचा जहाँ से वह पूरब की तरफ जाना चाहता था , मगर उसकी फौज ने साथ देने से इंकार कर  दिया क्यूंकि 10 वर्षों से विजय अभियान की लड़ाई से वे थक चुके थे और भारत की गर्म मौसम से उन्हें बिमारियों ने जकड़  लिया था दूसरी बात उन्हें सिंधु के किनारे भारतीय शौर्य का परिचय मिल चुका था, अतः उनमें से आगे बढ़ने के लिए कोई भी तैयार नहीं था। यूनानी इतिहासकार एरियन ने लिखा है :" युद्धकला में भारतवासी अन्य तत्कालीन जनों से अत्यंत श्रेष्ठ थे। "  यूनानी सैनिकों को विशेष रूप से ज्ञात हो गया था कि गंगा के किनारे एक बड़ी शक्ति राज्य है , निश्चित रूप से यह मगध के लिए था जहां पर उस समय नन्द वंश का शासन था और उसकी सेना सिकंदर की सेना से बड़ी थी। अंततः सिकंदर ने बहुत ही दुखी हो कर कहा कि "मैं उन दिलों में उत्साह भरण चाहता हूँ जो निष्ठावान थे लेकिन निष्ठाहीन और कायरतापूर्ण  डर से दबे हुए हैं। " और इस तरह जो राजा अपने शत्रुओं से कभी नहीं हरा और बड़ी बड़ी जंगों पर विजय प्राप्त की वह अपने ही लोगों से हार मानने को मजबूर हो गया और वापस लौटने को बाध्य हो गया इस तरह पूर्वी साम्राज्य का उसका सपना अधूरा रह गया । भारत में सिकंदर लगभग 19 माह रहा जिसके बीच वह लड़ाई ही करता रहा। सिकंदर जीते हुए राज्यों को कभी व्यवस्थित नहीं कर पाया और जिन राजाओं ने उसकी अधीनता स्वीकार कर  ली उन्हें उनका राज्य वापस लौटा दिया। परन्तु उसने अपने भू - भाग को 3 भागों में बाँट दिया और तीन यूनानी गवर्नरों के हाँथ सौंप दिया , यहां उसने कई नगर भी बनाए थे। सिकंदर ने भारत में 2 नगर बनाए थे पहला नगर निकैया(विजय नगर ) था और दूसरा अपने घोड़े के नाम पर बुकफेला।   
                  सिकंदर को उस रहस्यमय महासागर में दिलचस्पी हो गई थी जिसे उसने पहली बार सिंधु के मुहाने पर देखा था इसलिए उसने अपने नए बेड़े को अपने मित्र नियार्कस के नेतृत्व में सिंध नदी के मुहाने से फरात नदी के मुहाने तक समुद्र तट का पता लगाने और बंदरगाहों को खोजने के लिए रवाना किया था। कला क्षेत्र में गांधार शैली का भारत में विकास यूनानी प्रभाव का ही परिणाम है। 




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